अल्हड़ बीकानेरी

ख़ुद पे हँसने की कोई राह निकालूँ तो हँसूँ
अभी हँसता हूँ ज़रा मूड में आ लूँ तो हँसूँ

जिनकी साँसों में कभी गंध न फूलों की बसी
शोख़ कलियों पे जिन्होंने सदा फब्ती ही कसी
जिनकी पलकों के चमन में कोई तितली न फँसी
जिनके होंठों पे कभी भूले से आई न हँसी
ऐसे मनहूसों को जी भर के हँसा लूँ तो हँसूँ

अल्हड़ बीकानेरी

आप जितना भी चाहें बिगड़ लीजिये
दोष हम पर ज़माने का मढ़ लीजिये
हम हैं पुस्तक खुली हमको पढ़ लीजिये
अपने ऐबों को ढँकने की आदत नहीं

ओम प्रकाश आदित्य

दाल-रोटी दी तो दाल-रोटी खा के सो गया मैं
आँसू दिये तूने आँसू पिए जा रहा हूँ मैं
दुख दिए तूने मैंने कभी न शिक़ायत की
जब सुख दिए सुख लिए जा रहा हूँ मैं
पतित हूँ मैं तो तू भी तो पतित पावन है
जो तू करा ता है वही किए जा रहा हूँ मैं
मृत्यु का बुलावा जब भेजेगा तो आ जाउंगा
तूने कहा जिए जा तो जिए जा रहा हूँ मैं

कुँअर बेचैन

धड़कनें चुप हैं, अधर मौन, निगाहें ख़ामोश
ज़िंदगी और तुझे कैसे पुकारा जाए

अज्ञात

बदन के घाव दिखला कर जो अपना पेट भरता है
सुना है वो भिखारी ज़ख़्म भर जाने से डरता है

कुँअर बेचैन

उसने फेंके मुझपे पत्थर और मैं पानी की तरह
और ऊँचा, और ऊँचा, और ऊँचा उठ गया

नदीम शाहाबादी

लहूलुहान थे मुझको तराशने वाले
मैं एक सच था तो चेहरा मिरा बदलता क्या

गोग

आज मैं
एक बड़ा और इज़्ज़तदार आदमी
बन रहा था
तभी
किसी ने कहा-
"चल उठ!
सुबह हो गई है"

कृष्ण बिहारी नूर

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या ज़ुर्म है पता ही नहीं
इतने हिस्सों में बँट गया हूँ मैं
मिरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं
जड़ दो चांदी में चाहे सोने में
आईना झूठ बोलता ही नहीं
सच घटे या बढ़े तो सच न रहे
झूठ की कोई इंतिहा ही नहीं

परवीन शाक़िर

बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं देखा
इस जख़्म को हमने कभी सिलते नहीं देखा
इस बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश
उस शाख पे फिर फूल को खिलते नहीं देखा
यक लख्त गिरा है तो जड़े तक निकल आईं
जिस पेड़ को आंधी में भी हिलते नहीं देखा
काँटों में घिरे फूल को चूम आयेगी तितली
तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा
किस तरह मिरी रूह हरी कर गया आख़िर
वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा
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